अमेरिकी राजनीति और मध्य पूर्व की भू-राजनीति में इस वक्त एक नया मोड़ आया है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पूर्व कमांडर और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के वरिष्ठ रणनीतिकार मोहसेन रेजाई को एक पत्र भेजा। वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक इस खबर के बाहर आते ही खलबली मच गई।
लोग पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच बातचीत का कोई नया रास्ता खुल रहा है? या फिर यह सिर्फ एक और नाकाम कूटनीतिक चाल बनकर रह जाएगी?
सच्चाई यह है कि अमेरिका और ईरान के रिश्ते इस समय सबसे खतरनाक मोड़ पर हैं। एक तरफ ट्रंप प्रशासन की सैन्य हमले की चेतावनियां हैं, तो दूसरी तरफ बैकचैनल वार्ता का दौर। लेकिन वेंस का यह कदम कई मायनों में अप्रत्याशित और असाधारण माना जा रहा है।
बैकचैनल कूटनीति और जेडी वेंस का जोखिम भरा दांव
जेडी वेंस का मोहसेन रेजाई से संपर्क साधना कोई साधारण कूटनीतिक कदम नहीं है। रेजाई ईरान के सबसे कट्टरपंथी और प्रभावशाली सैन्य नेताओं में गिने जाते हैं। 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध के दौरान IRGC की कमान संभालने वाले रेजाई आज तेहरान के सुरक्षा ढांचे की सबसे मजबूत आवाज हैं।
वेंस यह समझना चाहते हैं कि क्या तेहरान वास्तव में बातचीत के जरिए किसी टिकाऊ समझौते के लिए तैयार है, या फिर दोनों देश अनिवार्य रूप से एक और सीधी सैन्य भिड़ंत की ओर बढ़ रहे हैं।
यह पहल वेंस के लिए अंदरूनी राजनीति में एक बड़ा जोखिम है। सार्वजनिक रूप से वेंस हमेशा अमेरिका प्रथम और सख्त विदेश नीति के समर्थक रहे हैं। जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सैन्य अभियान 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' की रूपरेखा तैयार की थी, तब वेंस ने निजी बैठकों में युद्ध को लंबा खींचने के जोखिमों पर सवाल उठाए थे। वे एक ज्यादा मजबूत और ठोस कूटनीति के पैरोकार रहे हैं।
बाद में जब ट्रंप ने उन्हें मध्य पूर्व से जुड़े शांति प्रयासों का मुख्य वार्ताकार बनाया, तो वेंस ने कतर और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थों के जरिए दो बार ईरानी प्रतिनिधियों से मुलाकात भी की।
जून में अमेरिका और ईरान के बीच एक शुरुआती समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर भी हुए थे। लेकिन वह हस्ताक्षर होने के दो हफ्ते के भीतर ही ताश के पत्तों की तरह ढह गया। वजह थी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही को लेकर दोनों देशों की पूरी तरह से अलग-अलग व्याख्याएं।
डोनाल्ड ट्रंप का विरोधाभासी रुख और अमेरिका में अंदरूनी खींचतान
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे उलझाने वाला पहलू राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान है। जब वाशिंगटन के पत्रकारों ने वेंस के इस पत्र को लेकर ट्रंप से सीधे सवाल पूछे, तो उन्होंने शांति वार्ता का मुख्य दूत बनने की बात से साफ इनकार कर दिया।
ट्रंप ने दावा किया कि वेंस का संदेश मुख्य रूप से मानवीय सहायता और मेडिकल सप्लाई से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि ईरान में लोग बीमार हैं और उन्हें दवाओं तथा चिकित्सा सामग्री की जरूरत है।
लेकिन हकीकत यह है कि व्हाइट हाउस के भीतर दो अलग-अलग धाराएं काम कर रही हैं:
- सैन्य दबाव का गुट: जो मानता है कि ईरान के परमाणु ठिकानों और मिसाइल बुनियादी ढांचे पर सीधे हमले किए बिना तेहरान को झुकाया नहीं जा सकता।
- व्यावहारिक कूटनीति का गुट: जेडी वेंस की अगुवाई में यह गुट मानता है कि एक और लंबा मध्य-पूर्व युद्ध अमेरिका के अपने राष्ट्रीय हितों और घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित होगा।
अमेरिकी विदेश नीति का यह दोहरापन तेहरान को और अधिक शंकित करता है। एक तरफ ट्रंप जनसभाओं में कहते हैं कि ईरान बातचीत टाल रहा है और चुनाव से पहले या बाद में सैन्य विकल्प हमेशा टेबल पर है, तो दूसरी तरफ वेंस बैकचैनल से सीधे रेजाई से संपर्क साध रहे हैं।
मोहसेन रेजाई का उभार और तेहरान के भीतर बदलता शक्ति संतुलन
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा बदलाव तेहरान के सत्ता गलियारों में देखने को मिल रहा है। पारंपरिक रूप से ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर ग़ालिबाफ़ जैसे व्यावहारिक या नरमपंथी नेता वाशिंगटन के साथ बैकचैनल वार्ताओं को संभालते थे।
लेकिन हाल के महीनों में जिस तरह से अमेरिका ने सैन्य धमकियां बढ़ाई हैं, उससे ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में मोहसेन रेजाई का कद और बढ़ गया है।
रेजाई का मुख्य वार्ताकार या प्राथमिक संपर्क बिंदु बनना इस बात का संकेत है कि अब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और IRGC सीधे कूटनीति की बागडोर अपने हाथ में ले रहे हैं।
रेजाई का रुख बेहद कड़ा रहा है। उन्होंने हाल ही में सार्वजनिक चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने कोई सैन्य हमला किया, तो ईरान सिर्फ अमेरिकी ठिकानों पर ही हमला नहीं करेगा, बल्कि क्षेत्रीय इंटरनेट केबलों, डेटा सेंटरों और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में मौजूद प्रमुख आर्थिक बुनियादी ढांचों को निशाना बनाएगा।
रेजाई ने स्पष्ट कर दिया है कि तेहरान 'न युद्ध, न शांति' (Neither War Nor Peace) की अनिश्चित स्थिति से बाहर निकलना चाहता है। लेकिन वे तब तक किसी औपचारिक मेज पर नहीं बैठेंगे जब तक अमेरिका उनकी बुनियादी शर्तों को स्वीकार नहीं करता।
गतिरोध की असली वजह: परमाणु रियायतें बनाम आर्थिक राहत
वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत हमेशा एक ही मुख्य मुद्दे पर आकर अटक जाती है: क्रम (Sequencing) क्या होना चाहिए?
| विषय | अमेरिकी रुख (Washington) | ईरानी रुख (Tehran) |
|---|---|---|
| प्राथमिकता | ईरान पहले अपना परमाणु संवर्धन रोके और मिसाइल कार्यक्रम सीमित करे। | अमेरिका पहले लगे हुए तमाम आर्थिक प्रतिबंध हटाए और तेल निर्यात की इजाजत दे। |
| सुरक्षा गारंटी | ईरान क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को फंडिंग देना पूरी तरह बंद करे। | अमेरिका गारंटी दे कि वह तेहरान में शासन परिवर्तन (Regime Change) की कोशिश नहीं करेगा। |
| भरोसा | किसी भी समझौते के उल्लंघन पर तत्काल सैन्य कार्रवाई का अधिकार। | अमेरिका पर पूर्व में समझौतों से पीछे हटने का आरोप और पुख्ता कानूनी सुरक्षा। |
वॉशिंगटन चाहता है कि तेहरान पहले परमाणु रियायतें दे, उसके बाद ही प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी। इसके विपरीत, ईरान का कहना है कि वे बिना किसी ठोस और तुरंत मिलने वाली आर्थिक राहत के अपने परमाणु कार्यक्रम पर एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे।
इसी विरोधाभास के कारण कतर और पाकिस्तान द्वारा कराई गई पिछली मध्यस्थता बैठकें भी बेनतीजा रही थीं।
क्या वाकई टल सकता है युद्ध? आगे का रास्ता और व्यावहारिक कदम
वर्तमान हालात को देखकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि जेडी वेंस के इस पत्र से शांति वार्ता की कोई स्थायी राह खुल जाएगी। यह एक बहुत ही नाजुक और खतरनाक कूटनीतिक प्रयोग है।
अगर इस गतिरोध को तोड़ना है, तो दोनों पक्षों को कुछ व्यावहारिक कदम उठाने होंगे:
- मानवीय गलियारा बनाना: जैसा कि ट्रंप ने मेडिकल सप्लाई का जिक्र किया, दवाओं और खाद्य पदार्थों पर से प्रतिबंध हटाकर एक विश्वास बहाली (Confidence Building) का माहौल तैयार किया जा सकता है।
- समुद्री गलियारे पर सीमित सहमति: होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी आचार संहिता बनाई जाए जिस पर दोनों पक्ष सहमत हों।
- मध्यस्थों की भूमिका बढ़ाना: क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कतर, ओमान और पाकिस्तान जैसे निष्पक्ष देशों को वार्ता के आधिकारिक ढांचे में शामिल किया जाए।
- घरेलू राजनीतिक बयानबाजी पर अंकुश: चुनावी रैलियों से दी जाने वाली सैन्य धमकियों को बंद किया जाए क्योंकि इससे बैकचैनल बातचीत के माहौल को भारी नुकसान पहुंचता है।
जेडी वेंस का मोहसेन रेजाई को पत्र लिखना यह तो साबित करता है कि वाशिंगटन में कम से कम एक धड़ा युद्ध के बजाय कूटनीति को एक आखिरी मौका देना चाहता है। लेकिन जब तक दोनों देश अपनी-अपनी जिद्द छोड़कर किसी मध्य मार्ग पर सहमत नहीं होते, तब तक मध्य पूर्व के क्षितिज पर मंडराते युद्ध के बादल छंटने वाले नहीं हैं।